कबूतर कोमल और बुद्धिमान पक्षी हैं, जो हमारे सम्मान और करुणा के पात्र हैं। कबूतरों को दाना देना सिर्फ एक दयालु कार्य नहीं है यह कई लोगों के लिए एक आध्यात्मिक परंपरा भी है। फिर भी, स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर फैली गलत जानकारी के कारण वर्तमान में मुंबई में कबूतरों को दाना देने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
मुंबई के कबूतरखाने सौ साल से भी अधिक पुराने हैं और अनगिनत नागरिकों खासकर बुज़ुर्गों को रोज़ाना इन कोमल पक्षियों को अंजुरी भर दाना अर्पित कर मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष मिला है। लेकिन अब, पीढ़ियों से इन कबूतरखानों में भोजन पा रहे कबूतरों के लिए उनकी जानी-पहचानी और भरोसेमंद भोजन की जगह बंद हो जाने से भूख से मरने का खतरा पैदा हो गया है।
क्या कबूतर स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं?
कबूतरों से रोग फैलने का डर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है। इंसानों के बीमार होने की संभावना एक-दूसरे से या साल्मोनेला से संक्रमित अंडों के सेवन से कहीं अधिक होती है, बजाय कबूतरों के संपर्क में आने से। Journal of Infection में प्रकाशित 60 वर्षों के शोध की व्यापक समीक्षा इस बात की पुष्टि करती है कि इंसानों में कबूतरों से बीमारी फैलने का जोखिम बहुत ही कम है — यहां तक कि उनके साथ नियमित रूप से काम करने वाले लोगों के लिए भी। University of Edinburgh ने यह भी पाया कि कबूतर बर्ड फ्लू के प्रति प्रतिरोधक होते हैं, इसलिए उसके प्रसार के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कबूतरों को दाना देना कानूनी और नैतिक कर्तव्य है
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के अनुसार किसी भी पशु को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाना गैरकानूनी है, और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(g) के तहत नागरिकों का यह मूल कर्तव्य है कि वे प्राणियों के प्रति करुणा रखें।
आगे का रास्ता
कबूतरों को दाना देना ज़िम्मेदारी के साथ किया जाए तो यह पूरी तरह से प्रबंधनीय है। समस्याएं खुद दाना देने से नहीं, बल्कि सफाई की कमी से पैदा होती हैं। यदि दाना देने के स्थानों का उचित प्रबंधन किया जाए, कचरे को नियंत्रित किया जाए, सफाई व्यवस्था सुनिश्चित हो और लोगों को शिक्षित व जागरूक किया जाए, तो कबूतरों और इंसानों के बीच शांतिपूर्ण और सुरक्षित सह-अस्तित्व संभव है।
अपनी राय ज़रूर दें!
BMC इस विषय पर 18 अगस्त से 29 अगस्त के बीच जनता की राय मांग रही है। PETA इंडिया निम्नलिखित सुझाव देता है:
• कबूतरखानों को आधिकारिक पिजन-फीडिंग ज़ोन घोषित किया जाए, जहां तय समय, उपयुक्त दाना और कचरा, ब्रेड और प्लास्टिक पर सख्त प्रतिबंध हो।
• नियमित रूप से सफाई अभियान चलाए जाएं, जिसमें कबूतरों की बीट को साफ किया जाए। इस कचरे का उपयोग कम्पोस्टिंग के ज़रिए टिकाऊ समाधान में बदला जा सकता है।
• बहुभाषी जागरूकता अभियान चलाए जाएं ताकि लोगों के बीच फैली भ्रांतियों को दूर किया जा सके — कबूतर स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं हैं, और उन्हें दाना देना मुंबई की करुणा से भरी संस्कृति का हिस्सा है।
• कबूतर आबादी के मानवीय प्रबंधन के लिए वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त PiCAS (Pigeon Control Advisory Service) मॉडल पर विचार किया जाए।
आप क्या कर सकते हैं?
अब समय है अपनी आवाज़ बुलंद करने का। नीचे दिया गया फॉर्म भरकर आप सुनिश्चित कर सकते हैं कि एक करुणामय और टिकाऊ समाधान लागू किया जाए।