वन्यजीवों, बेघर कुत्तों और बिल्लियों पर हो सकते हैं दर्दनाक प्रयोग – अभी आवाज़ उठाएँ!

प्रस्तावित नियमों से वन्यजीवों को पकड़ने, बेघर कुत्तों और बिल्लियों पर प्रयोग करने और उन्हें गंभीर तकलीफ़ पहुँचाने के रास्ते खुल सकते हैं जबकि भारत और दुनिया पशुओं के बिना होने वाले वैज्ञानिक शोध की ओर बढ़ रहे हैं

वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवासों से पकड़कर लाना, बेघर कुत्तों और बिल्लियों पर प्रयोग करना, पशुओं को बिजली के झटके देना, उनके शरीर में ट्यूमर पैदा करना और उन्हें दूसरी तरह की गंभीर तकलीफ़ पहुँचाना, ये कुछ ऐसी चिंताजनक संभावनाएँ हैं, जिन्हें भारत के प्रस्तावित पशु प्रयोग नियमों से बढ़ावा मिल सकता है।

PETA इंडिया ने चेतावनी दी है कि पशु क्रूरता निवारण (प्रयोग, प्रजनन और प्रयोगशाला पशुओं के व्यापार का नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण) नियम, 2026 के मसौदे के कुछ प्रमुख प्रावधान पशुओं को मिलने वाली मौजूदा सुरक्षा को कमज़ोर कर सकते हैं। ऐसा उस समय हो रहा है, जब भारत सहित दुनिया के कई देश पशुओं का इस्तेमाल किए बिना आधुनिक वैज्ञानिक शोध की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

PETA इंडिया इन प्रस्तावित नियमों को वापस लेने की माँग कर रहा है। आप भी अपनी आपत्तियाँ और सुझाव भेजकर इस प्रयास में मदद कर सकते हैं।

इन नियमों से पशुओं को कैसे ख़तरा हो सकता है?

PETA इंडिया ने चेतावनी दी है कि प्रस्तावित नियम प्रयोगशालाओं में पशुओं की तकलीफ़ बढ़ा सकते हैं। इनके तहत:

  • प्रयोगों के लिए वन्यजीवों को ज़्यादा संख्या में पकड़ने का रास्ता खुल सकता है: मसौदे में अस्पष्ट ‘वैज्ञानिक औचित्य’ के आधार पर, वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित वन्यजीवों, यहाँ तक कि संकटग्रस्त प्रजातियों को भी पकड़कर प्रयोगों में इस्तेमाल करने की अनुमति देने का प्रावधान है।

  • बेघर कुत्तों और बिल्लियों पर ख़तरा बढ़ सकता है: मसौदे के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में बेघर पशुओं पर प्रयोग करने की अनुमति दी जा सकती है।

  • पशुओं को असहनीय दर्द और तनाव देने वाले प्रयोगों की अनुमति मिल सकती है: मसौदे में ऐसे प्रयोगों की गुंजाइश है, जिनमें पशुओं को बचने का कोई रास्ता दिए बिना बिजली के झटके देना, कुत्तों और बंदरों जैसे सामाजिक स्वभाव वाले पशुओं को लंबे समय तक अकेले रखना, उनके शरीर में ट्यूमर पैदा करना और ऐसे विषाक्तता परीक्षण करना शामिल है, जिनमें पशु की मृत्यु को परीक्षण का अंतिम परिणाम माना जाता है। हालाँकि मसौदे में ऐसी गंभीर तकलीफ़ पर रोक लगाने की बात है, जिसे लंबे समय तक कम नहीं किया जा सकता, फिर भी इसमें ऐसे प्रयोगों की अनुमति दी गई है, जिनसे पशुओं को गंभीर तकलीफ़ हो सकती है।

  • स्वतंत्र निगरानी और पशु कल्याण की मौजूदा सुरक्षा कमज़ोर हो सकती है: मौजूदा नियमों के तहत कुत्तों, घोड़ों, सूअरों और मवेशियों जैसे बड़े पशुओं पर होने वाले सभी प्रयोगों के लिए केंद्रीय पशु प्रयोग नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण समिति (CCSEA) की मंज़ूरी ज़रूरी है। लेकिन नए मसौदे में हल्के या मध्यम स्तर के प्रयोगों को संबंधित संस्थान की नैतिक समिति से ही मंज़ूरी देने की अनुमति है। खरगोश जैसे छोटे पशुओं पर गंभीर प्रयोग या ऐसे प्रयोग भी किए जा सकते हैं, जिनके बाद पशु को होश में नहीं लाया जाता, और इसके लिए CCSEA की समीक्षा ज़रूरी नहीं होगी।

  • प्रशिक्षण के लिए भी पशुओं पर प्रयोग किए जा सकते हैं: मसौदे का नियम पशुओं को प्रशिक्षण और शिक्षा के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति देता है, जिसमें व्यावसायिक कौशल सिखाना भी शामिल है। यह पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 17(2)(f) के विपरीत है। इस धारा में स्पष्ट कहा गया है कि जहाँ तक संभव हो, केवल हाथ से काम करने का कौशल सीखने के लिए पशुओं पर प्रयोग नहीं किए जाने चाहिए।

मसौदे में गैर-मानव प्राइमेट्स, जिनमें रीसस मकाक बंदर भी शामिल हैं, पर प्रयोगों को लेकर भी चिंताजनक छूट और अस्पष्टताएँ हैं। वर्ष 2022 में वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम में संशोधन के बाद इन बंदरों को पहले मिलने वाली अनुसूची II की सुरक्षा नहीं रही।

भारत को पीछे नहीं, आगे बढ़ना चाहिए

भारत पहले ही पशुओं पर परीक्षणों से दूर जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा चुका है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2023 में नई औषधि और क्लिनिकल परीक्षण नियम, 2019 में संशोधन करके ऐसे आधुनिक तरीकों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई, जिनमें पशुओं का इस्तेमाल नहीं होता और जो मानव जीवविज्ञान पर आधारित हैं। इनमें कोशिकाओं पर आधारित परीक्षण, चिप पर विकसित मानव अंगों के मॉडल, कंप्यूटर मॉडलिंग और परीक्षण के अन्य तरीके शामिल हैं।

अमेरिका की खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA), अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH), अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA), यूरोपीय आयोग और ब्रिटेन की सरकार भी अलग-अलग तरीकों से पशुओं के बिना परीक्षण करने की विधियों के बढ़ते इस्तेमाल की दिशा में कदम उठा चुके हैं।

ऐसे समय में भारत को मौजूदा सुरक्षा उपायों को कमज़ोर करने या पशुओं पर प्रयोग के नए रास्ते खोलने के बजाय, वैज्ञानिक रूप से उन्नत ऐसे तरीकों को बढ़ावा देना चाहिए जिनमें पशुओं का इस्तेमाल न हो। साथ ही, पशु कल्याण की सुरक्षा को और मज़बूत किया जाना चाहिए।

PETA इंडिया प्रस्तावित नियमों को वापस लेने की माँग करता है और ऐसे मज़बूत नियम बनाने की अपील करता है, जो वन्यजीवों और समुदाय में रहने वाले पशुओं की रक्षा करें, स्वतंत्र निगरानी और मौजूदा सुरक्षा उपायों को बनाए रखें तथा वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय उन तरीकों को प्राथमिकता दें, जिनमें पशुओं का इस्तेमाल नहीं होता।.

अभी कदम उठाएँ: इन ख़तरनाक प्रस्तावित नियमों को रोकने में मदद करें!

वन्यजीवों, बेघर कुत्तों, बिल्लियों, खरगोशों और अनगिनत अन्य पशुओं को आपकी मदद की ज़रूरत है!

प्रस्तावित नियमों पर आपत्तियाँ और सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हैं। कृपया पशुओं के पक्ष में आवाज़ उठाने के लिए कुछ समय निकालें, अपनी आपत्तियाँ और सुझाव भेजें और इन मसौदा नियमों को वापस लेने की माँग करें।

कृपया 30 अक्टूबर 2026 तक अपनी आपत्तियाँ और सुझाव भेजें।

Dr
S.K.
Dutta
Committee for Control and Supervision of Experiments on Animals CCSEA

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